सीवान : श्रीमद् वाल्मीकि रामायण के प्रथम श्रोता थे भईया शत्रुध्न – डॉ लवी मैत्रेय शर्मा
सीवान || जिले के हसनपुरा नगर पंचायत के उसरी शिव मंदिर परिसर में चैत्र नवरात्र तथा हिन्दू नववर्ष के मंगल बेला में रामनवमी सेवा समिति, बजरंग दल, आयुष्मान सेवा संघ तथा हियुवा द्वारा नौ दिवसीय श्रीराम जन्मोत्सव सह श्रीरामचरितमानस नवाह परायण महायज्ञ का आयोजन किया गया है. जहां सुबह-शाम भक्तों एवं श्रद्धालुओं का तांता लग रहा है.

वहीं इस महायज्ञ के तीसरे दिन शनिवार संध्या व्यास मंच पर विराजमान श्रीधाम वृंदावन से पधारी रामकथा मर्मज्ञ डॉ लवी मैत्रेय शर्मा द्वारा श्रद्धालु भक्तों को लव-कुश जन्म, राजकुमार शत्रुध्न द्वारा उनका जातकर्म संस्कार, लवडासुर वध, लव-कुश द्वारा भईया शत्रुध्न को वाल्मीकि आश्रम में राम कथा सुनना एवं पुनः अयोध्या के दरबार में जाकर स्वयं मर्यादा पुरूषोतम श्रीरामचंद्र जी को राम कथा सुनने के प्रसंग का वर्णन किया. लवी दीदी ने कहा कि तमसा नदी के किनारे स्थित वाल्मीकि आश्रम में माता सीता ने राम के परित्याग के बाद जुड़वां पुत्रों लव और कुश को जन्म दिया. ऋषि वाल्मीकि ने बड़े पुत्र का नाम ‘कुश’ (कुश घास से) और छोटे का ‘लव’ (लव घास से) रखा. लव-कुश को वेदों, रामायण व युद्ध कला में निपुण बनाया. दोनों बालक आश्रम में ही वीर और गुणी रूप में विकसित हुए. जिन्हें वन देवी (सीता) लोरी सुनाकर सुलाती थीं. इधर अयोध्या में राजा रामचंद्र जी के आदेश पर राजकुमार शत्रुध्न मधुदैत्य के पुत्र मधुपुर (मथुरा) के राजा लवणासुर के राज्य पर आक्रमण के लिए जाने के क्रम में वाल्मीकि मुनि के आश्रम में पहुंचे. जहां उन्होंने महर्षि वाल्मीकि के कहने पर वन देवी के पुत्रों लव और कुश का जातकर्म संस्कार किया.
आगे कथा वाचिका ने बताया कि ऋषि वाल्मीकि से आशीर्वाद प्राप्त कर शत्रुध्न लवणासुर वध के लिए प्रस्थान कर गए. लवड़ासुर मधुपुर (मधुवन) का राजा था और रावण का रिश्तेदार (भतीजा) था. वह महादेव का परम भक्त था और उसके पास एक शक्तिशाली त्रिशूल था. जिसके बल पर वह ऋषियों को मारता था. प्रभु राम ने अपने भाई शत्रुघ्न को लवणासुर को मारने की जिम्मेदारी दी. च्यवन ऋषि की सलाह पर शत्रुघ्न ने तब आक्रमण किया जब लवणासुर प्रातःकाल सूर्य को जल चढ़ा रहा था और उसके पास वह दिव्य त्रिशूल नहीं था. शत्रुघ्न ने लवणासुर का वध किया और वहां मधुपुर (वर्तमान मथुरा) नगरी की स्थापना की. मधुपुर विजय के बाद अयोध्या लौटने के क्रम में शत्रुध्न पुनः वाल्मीकि मुनि के आश्रम पहुंचे. वाल्मीकि ने लव-कुश को रामायण गाकर सुनाने की शिक्षा दी थी. मुनि के आदेश पर लव और कुश ने मथुरा के राजा शत्रुध्न को पहली बार राम कथा सुनाई. जहां लव और कुश व्यासपीठ पर थे और श्रोता थे भईया शत्रुध्न. पुनः गुरु के आदेश पर वन देवी के पुत्र लव और कुश अयोध्या के गली-गली और द्वार-द्वार पर जा राम कथा अयोध्या वासियों को सुनते है. मुनि कुमारों से राम कथा सुन अवधपुरी में तरह तरह की चर्चा होने लगती है. यह खबर राज दरबार में पहुंचती है. प्रभु श्रीराम मुनि कुमारों को दरबार में बुलाते हैं और सम्मान आसन दे उन्हें महर्षि वाल्मीकि द्वारा रचित राम कथा सुनाने का आग्रह करते हैं. हालांकि लव-कुश यह नहीं जानते थे कि राम उनके पिता हैं, लेकिन वे रामायण के माध्यम से अयोध्या वासियों को माता सीता के त्याग और पवित्रता का बोध कराते हैं.

वहीं लव-कुश ने जब “हम कथा सुनाते राम सकल गुण धाम की” भजन गाया, तो पूरी राजसभा मुग्ध हो गई. इसमें राम के वनवास से लेकर सीता हरण, लंका दहन और सीता त्याग का मार्मिक वर्णन था. अपनी गाथा सुनकर श्रीराम अत्यंत भावुक हो गए. वे लव-कुश के गायन से प्रसन्न होकर उन्हें गले लगाते हैं और उनके दिव्य स्वरूप को जानकर हैरान रह जाते हैं. इस कथा के माध्यम से अयोध्या वासियों को यह एहसास हुआ कि माता सीता ने कितना बड़ा त्याग किया है. आरती और प्रसाद वितरण के उपरांत तीसरे दिन के कथा को विराम दिया गया. (ब्यूरो रिपोर्ट).