सीवान : धर्म की स्थापना और राक्षसी प्रवृतियों के नाश के लिए भगवान की इच्छा थी वनवास – डॉ लवी मैत्रेयी शर्मा
सीवान || हसनपुरा नगर पंचायत के उसरी शिव मंदिर परिसर में हिंदू युवा वाहिनी, बजरंग दल, आयुष्मान सेवा संघ और रामनवमी सेवा समिति द्वारा बसंत नवरात्र और हिंदू नववर्ष के आगमन पर विगत 19 मार्च से आयोजित नौ दिवसीय श्रीराम जन्मोत्सव समारोह तथा संगीतमय श्रीराम कथा में श्रद्धालु भक्तों की भारी भीड़ उमड़ रही है. श्रीराम कथा के सातवें दिन बुधवार संध्या व्यास पीठ पर विराजमान श्रीधाम वृंदावन से पधारी राम कथा मर्मज्ञ डॉ लवी मैत्रेयी द्वारा अपने सुमधुर वाणी से श्रद्धालु श्रोताओं को राम वन गमन, सीता हरण, रावण वध की कथा सुनाई गई.

कथावाचिका लवी मैत्रेयी ने कहा कि श्रीराम जी का वनवास रामायण का एक महत्वपूर्ण प्रसंग है. चारों पुत्रों का विवाह होने के बाद राजा दशरथ ने अपने ज्येष्ठ पुत्र श्रीराम को अयोध्या का राजा बनाने का निर्णय लिए. यह समाचार सुन नगर में खुशियां मनाई जाने लगीं. जिस शुभ नक्षत्र में भगवान राम का राज्याभिषेक होना था. इसी बीच महारानी कैकेयी ने राजा दशरथ से राम को चौदह वर्ष वनवास का वर मांग लिया. प्रभु श्रीराम माता-पिता की आज्ञा का पालन करते हुए भाई लक्ष्मण व पत्नी सीता के साथ वन के लिए प्रस्थान किया. अयोध्या वासियों की स्थिति का वर्णन करते हुए डॉ शर्मा ने कहा कि जहा अयोध्या में राजकुमार राम के राज्याभिषेक की खुशी थी. वहीं उनके वनवास की खबर सुन पूरा नगर शोक में डूब गया. जब भगवान राम गंगा नदी पार करने के लिए उसके तट पर पहुंचे तो यह खबर सुनते ही निषाद राज गुह्य खुशी से फूले नही समाए, उन्हें नदी के पार उतारा. जब भगवान राम उतराई के तौर पर निषाद को मां सीता की अंगूठी देने लगे तो निषाद राज ने कहा कि हे भगवान जिस तरह मैने आपको नैया से गंगा के इस पार उतारा है, उसी प्रकार आप मेरी भी नैया को भवसागर से उस पार लगा लेना. इधर पुत्र विक्षोह से व्याकुल होकर राजा दशरथ ने अपने प्राणों का परित्याग कर दिया. राम वन गमन की कथा सुन श्रद्धालुओं की आंखे भर आईं. इस दौरान मैत्रेयी जी ने बताया कि राजा दशरथ को अध्यात्मिक अर्थ में वेद का प्रतीक माना गया है और उनकी तीनों रानियों क्रमशः कौशल्या, सुमित्रा और कैकेई को ज्ञान, उपासना और क्रिया का प्रतीक माना गया है. अर्थात् वेद की तीन पत्नियों के नाम क्रमशः ज्ञान, उपासना और क्रिया है. इनमें ज्ञान और उपासना तो दोष से परे होते हैं किन्तु क्रिया सदैव दोष युक्त होती है. यही कारण है कि सरस्वती जब देवताओं के कहने पर राम वन गमन के लिए कोई माध्यम ढुंढ़ने अयोध्या पहुंची तो उसने मंथरा के माध्यम से क्रिया की प्रतीक कैकेई को अपना शिकार बनाया, क्योंकि क्रिया कदापि दोषरहित नहीं होती. फलस्वरूप क्रिया रूपी कैकेई ने वेद रूपी दशरथ को अपने प्रभाव में लेकर राम वन गमन को अंजाम दिया. आगे लवी जी ने बताया कि प्रभु श्रीराम का वनवास एक घटना नहीं अपितु धर्म की रक्षा और राक्षसी प्रवृतियों के नाश के लिए भगवान की इच्छा थी. पिता के वचनों का पालन करने के लिए राम, सीता और लक्ष्मण वन गए. पंचवटी में रावण की बहन शूर्पणखा ने राम-लक्ष्मण को मोहित करने का प्रयास किया और सीता को मारने की कोशिश की. जिसके बाद लक्ष्मण ने उसकी नाक काट दी. बदले की भावना से रावण ने मारीच को मायावी सुनहरे हिरण का रूप धारण करा कर भेजा. सीता जी के आग्रह पर राम हिरण के पीछे गए और उसे मार गिराया. मारीच ने मरते समय राम की आवाज में सीता और लक्ष्मण को मदद के लिए पुकारा. सीता जी के व्याकुल होने पर लक्ष्मण ने कुटिया के चारों ओर ‘लक्ष्मण रेखा’ खींची और राम की खोज में गए.
रावण साधु का वेश धरकर आया और सीता को रेखा से बाहर आने पर मजबूर कर उनका हरण किया. रास्ते में जटायु ने रावण से युद्ध किया पर रावण ने उसके पंख काट दिया. सीता की खोज में राम-हनुमान और सुग्रीव हुआ. बाली वध के उपरांत वीर बजरंगी का अशोक वाटिका में पहुंच राम जी का संदेश पहुंचाना. लंका दहन के बाद राम सेतु निर्माण, राम-रावण युद्ध हुआ. युद्ध में रावण के सभी महारथी मारे गए. विभीषण ने राम को बताया कि रावण की नाभि में अमृत है. राम ने अपनी दिव्य शक्ति से रावण की नाभि में बाण मारकर उसका अमृत सुखा दिया और अंततः रावण का वध कर दिया और अधर्म पर धर्म का विजय हुआ. राक्षसी प्रवृतियों का नाश हुआ. आरती और प्रसाद वितरण के उपरांत सातवें दिन की कथा को विराम दिया गया. (सीवान के हसनपुरा से अभय शंकर की रिपोर्ट).