सीवान : विदेशी शोधार्थियों एवं बौद्ध भिक्षुओं ने दरौली क्षेत्र का भ्रमण किया, 22 सौ वर्ष प्राचीन विरासत बचाने की दरकार
सीवान || जिले के दरौली प्रखंड मुख्यालय से 2 किलोमीटर पश्चिम अमर पुर केवटलिया गांव में सरयू नदी के दक्षिणी तट पर प्राचीन इमारत अपनी प्राचीनता का बोध करा रहा है, जो सीवान जिले का महत्वपूर्ण पुरातात्विक साक्ष्य है. केंद्र सरकार एवं बिहार सरकार पुरातात्विक महत्व के स्थलों एवं विरासत को संरक्षित करने की बात तो करती है पर अमरपुर केवटलिया का यह प्राचीन धरोहर जीर्णशीर्ण अवस्था में आंसू बहा रहा है तथा अपनी उद्धार का इंतजार कर रहा है. इस अद्भुत एवं अनमोल विरासत के प्रति किसी भी जनप्रतिनिधि एवं सरकार के नुमाइंदे का नजर न पड़ना घोर आश्चर्य की बात है. इस इमारत की ईंट मौर्य. कुषाण एवं गुप्तकालीन है जो स्पष्ट रूप से दृष्टिगोचर हो रहा है.

मंगलवार के प्रातः बेला में विदेशी बौद्ध शोधार्थियों एवं भिक्षुओं ने इस स्थल पर घंटों साधना किया तथा इसके एक ईंट को अपने साथ परीक्षण तथा पूजन के लिए ले गए.।पूरे इमारत को बड़े ही उत्सुकता से अवलोकन किए. इमारत के अंदर सुंदर कलाकीर्ति बना हुआ है जिसमें कमल का फूल एवं चक्र तथा देवी देवताओं का तख्त आज भी विद्यमान है. वियतनाम के बौद्ध भिक्षु बोधि चिता माता ने कहा कि केंद्र तथा राज्य सरकार को चाहिए कि पूरे जिले के पुरातात्विक स्थलों को संरक्षित करें ताकि पुरातन विरासत बचा रहे.
वियतनाम के धम्म चिता ने बताया कि सीवान जिले के कण कण में भगवान बुद्ध का उपदेश गूंजा है. वहीं शोधार्थी सह भंते डा अशोक शाक्य ने बताया कि इस इमारत की ईंट एवं कलाकीर्ति, कमल का फूल तथा चक्र अपनी प्राचीनता का भान करा रहा है तथा इसके अंदर कुलकुल देवी का पूजन सनातन संस्कृति एवं परंपरा का स्वरूप है.
ग्रामीण जानकार बताते है कि इस क्षेत्र में तीन बहुत बड़े बौद्ध मंदिर थे. एक दोन में,दूसरा अमरपुर में और तीसरा सिकन्दर पुर में था.।ये तीनों मंदिर उस समय इतने ऊंचे भीट पर स्थित थे कि जब रात में इस मंदिर के पास आग या दीप जलाई जाती थी तो एक भीट के ऊपर चढ़ने पर बाकी दो दीप प्रत्यक्ष रूप से देखे जा सकते थे. ग्रामीणों का कहना है कि लगभग 80-90 वर्ष पूर्व तक यहां पर बौद्ध भिक्षु प्रायः आया करते थे. हालांकि वर्ष 20 15 एवं 2018 में भी यहां वियतनाम, थाईलैंड, वर्मा, श्रीलंका एवं बौद्ध गया से बौद्ध भिक्षु आये थे तथा पूजा अर्चना किये थे. गत माह पूर्व पर गुजरात,महाराष्ट्र एवं बोधगया से पुरातात्विक छात्र शोध करने आये थे जो इसमें लगे ईंट को मौर्य, कुषाण एवं गुप्तकाल के बताए तथा इसे बौद्ध बिहार बता रहे थे.
शोधार्थी विशाल भंते ने बताया कि भगवान बुद्ध सरयू नदी के तट पर पटना से वैशाली होते अयोध्या जाने के क्रम में सरयू नदी के तट पर वर्षाप्रवास किये हैं. प्राचीन काल में ये पूरा क्षेत्र मल्ल गणराज्य में आता था तथा मल्ल राजा भगवान बुद्ध के परम शिष्य थे जो इस बौद्ध बिहार को बनाये हो.।उन्होंने बताया कि निश्चित ही यह स्थान बौद्ध धर्म से संबंध रखता है. शोधार्थी डा कृष्ण कुमार सिंह विदेशी बौद्ध शोधार्थियों को विस्तार से बताते हुए कहा कि दोन में जो गढ़ देवी की पत्थर की प्रतिमा है जो बौद्ध धर्म की तारा की प्रतिमा है. यहां गढवाल राजा गोविंदचंद्र देव का एक ताम्र लेख मिला है जो बौद्ध के अनुयायी थे तथा इनकी विवाह सिवान जिले के नौतन प्रखण्ड हथौजी (पीढ़ी) के पाल जागीरदार देवरक्षित की पुत्री कुमार देवी से हुआ था. कुमार देवी की मां शंकरा देवी अंग के राष्ट्रकूट मथाना देव की बेटी थी जो एक पाल सामंत भी थी जो महायान बौद्ध थी तथा कुमार देवी भी बौद्ध उपासक थी जो सारनाथ स्थित एक बौद्ध बिहार और बुद्ध मूर्ति का उद्धार कराया था. उन्होंने बताया कि वर्ष 2022 में हथौजी गांव में मिट्टी की खुदाई में खेत से पाल कालीन मूर्तिया मिली है जिसे ग्रामीणों ने मंदिर बनाकर उसी गांव में स्थापित किया है तथा वहां बहुत बड़ा गढ़ भी है. डॉ सिंह ने बताया कि जो अभिलेख दोन में मिला था उसमें वर्णन है कि “बड” ग्राम ने यह ताम्र पत्र एक ब्राह्मण को दिया गया था, आज भी दोन से सटे बहोरवां एक गांव है. उन्होंने बताया कि हुएनसांग भी अपनी यात्रा वृतांत में बड ग्राम का उल्लेख किया है तथा बताया है कि उस गांव में एक ब्राम्हण थे, जो बौद्ध अनुयायी थे जिनके यहां मैं भोजन किया था. आज भी इस गांव में वत्स गोत्र के अधिकांश ब्राह्मण है जो समृद्ध है. गांव के पश्चिम आज भी रेह वाला एक भूखण्ड है जिसके एक खंड को नष्ट कर बांध बना दिया गया है. बुजुर्ग ग्रामीण बताते है कि बहुत पहले किसी दानी राजा ने यह गांव ब्राह्मण को दान में दिया था. इस गांव में 65% वत्स गोत्र के ब्राह्मण है. उपरोक्त सभी साक्ष्यों से स्पष्ट है कि प्राचीनकाल में दरौली बौद्ध क्षेत्र रहा है तथा अमरपुर केवटलिया का खंडहर इमारत बौद्ध बिहार है. (ब्यूरो रिपोर्ट).